डिजिटल युग में अपनों को याद करने और उनकी खैर-कुशल पूछने के तौर-तरीके पूरी तरह बदल चुके हैं. आज सुबह होते ही मोबाइल स्क्रीन रंग-बिरंगे फूलों, प्राकृतिक दृश्यों और तरह-तरह के संदेशों से भर जाती है. संकेत की भाषा में हाथ जोड़कर नमस्ते करना, 'जय राम जी की' कहना या फिर खूबसूरत तस्वीरों के साथ 'सुप्रभात' भेजना अब रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. इन सभी संदेशों का केंद्रीय भाव एक ही होता है कि हम अपने प्रियजनों के अच्छे दिनों की कामना करते हैं और उनके लिए दुआएं मांगते हैं. ये चित्र और संदेश हमारी भावनाओं को प्रदर्शित करने का माध्यम बनते हैं. लेकिन, आज इस तरह की शुभकामनाओं के पीछे छिपे गहरे अर्थ और उनकी वास्तविकता पर चर्चा करना बेहद जरूरी लगता है. अक्सर ऐसे संदेशों में कुछ ऐसी तस्वीरें और कल्पनाएं होती हैं, जो सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि इन्हें भेजने वाले और बनाने वाले की असली मंशा क्या है. क्या यह सिर्फ एक औपचारिकता है या इसके पीछे कोई वास्तविक सरोकार भी छिपा हुआ है.
कटे तने पर फूल खिलाने की अजीब कल्पना
अक्सर सोशल मीडिया पर ऐसे संदेश आते हैं जिनमें किसी पुराने, सूखे या पूरी तरह से कट चुके पेड़ के तने पर रंग-बिरंगे फूल खिले हुए दिखाई देते हैं. ऐसे में किसी भी संवेदनशील और तार्किक व्यक्ति के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इसका क्या मतलब होगा. इस तरह के संदेश को तैयार करने वाला और इसे आगे प्रेषित करने वाला आखिर क्या कहना चाहता है. क्या कोई भी व्यक्ति असल जिंदगी में किसी कटे हुए तने या सूखे ठूंठ पर रंग-बिरंगे फूलों के उगने की कल्पना कर सकता है. कल्पना के स्तर पर तो यह सब कुछ संभव है और यह बहुत सुंदर भी लग सकता है, लेकिन ऐसी कल्पना का क्या फायदा जो सिर्फ और सिर्फ एक कोरी समीक्षा या दिखावा व्यक्त करती हो. हकीकत की जिंदगी से जिसका दूर-दूर तक कोई नाता न हो, वैसी शुभकामनाओं को भेजने का क्या औचित्य है.
हकीकत से दूर होती जा रही हैं हमारी रोज की जिंदगी
जब हम रोज सुबह इन संदेशों को देखते हैं, तो देखते-देखते और सोचते-सोचते मन में यह विचार आने लगता है कि क्या हमारी भावनाएं भी इन नकली और कटे हुए पेड़ों की तरह तो नहीं होती जा रही हैं. मुझे लगता है कि मेरे जैसे तमाम और भी लोगों को अक्सर यह महसूस होता होगा कि ऐसी सद्भावनाओं और कल्पनाओं का आखिर वास्तविक जीवन में क्या मतलब रह जाता है. यदि ये संदेश केवल एक क्लिक के जरिए बिना किसी गहरी भावना के भेजे जा रहे हैं, तो इनका प्रभाव शून्य हो जाता है. इनमें छिपी कृत्रिमता साफ तौर पर दिखाई देने लगती है जो इंसानी रिश्तों की गर्माहट को कम करती है.
दिखावे की जगह वास्तविक जुड़ाव पर विचार करना जरूरी
अगर आप इस बात से पूरी तरह सहमत हैं, तो आपको भी इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए. कोशिश यह होनी चाहिए कि हमारी शुभकामनाओं और हमारे कर्मों के बीच कोई न कोई सीधा नाता जरूर बने. केवल डिजिटल माध्यमों पर असंभव और कृत्रिम दृश्यों को साझा करने के बजाय, हमें हकीकत की जिंदगी में अपनों से जुड़ना चाहिए. जब तक हमारी सद्भावनाएं वास्तविक धरातल पर नहीं उतरेंगी, तब तक इन सुबह के संदेशों का कोई वास्तविक मूल्य नहीं रह जाएगा. इसलिए जरूरी है कि हम दिखावे की इस दुनिया से बाहर निकलें और रिश्तों में असली संवाद स्थापित करें.